लोफ़ो, लॉकडाउन और हज़रतगंज !
लखनऊ अब लोफ़ो के लिए नया नहीं रहा, पिछले कुछ महीनों में लोफ़ो ने इस नवाबी शहर में लगभग ५०० कि.मी. के सैर की है। आइए आज मैं और लोफ़ो आपको “दिले-ए-लखनऊ-हज़रतगंज” की यात्रा पे ले चलते हैं | #lofo #ganj #lockdown #Lucknow #awadh #Corona जिस गंज पे हर लखनऊ वाले का दिल धड़के, ना थी इतनी सूनी और शांत उस गंज की सड़के ! अगर कनॉट प्लेस दिल्ली का दिल है तो हज़रतगंज लखनऊ की धड़कन ! आज का हज़रतगंज पुरानी नवाबी नज़ाकत और आधुनिकता का अनोखा संगम है ! जो चाहिए वो मिलेगा यहाँ, चाहे सैर सपाटा हो या शॉपिंग या फिर फ़िल्म और खान पान, हर उम्र और वर्ग के लिए । लखनऊ के मध्य में बसा लगभग हज़रतगंज २०० साल से भी ज़्यादा पुराना है, इस मार्केट की स्थापना १८२७ में नवाब “नासिर उद दीन हैदर” ने चाइना बाज़ार और कप्तान बाज़ार नीव रख कर की थी, जहाँ कई बाहरी देशों से आया हुआ समान बिकता था । १८४२ में इसका नाम हज़रतगंज पड़ा, तब के नवाब “अमजद अली शाह”के नाम पर, जिनको सम्मान से “हज़रत” नाम से जाना जाता था ! तब के हजरतगंज में मुग़ल क़ालीन निर्माण शैली की छाप थी, १८५७ में ब्रिटिश हुकूमत ने हज़रतगंज का पुनर...